पहली बार अपने ब्लाग पर कविता लिखी है मैंने। बस बैठे बैठे ये ख्याल आया कि हम इस क्षण को जी लेने की जद्दोजेहद में हैं..और हर क्षण बस यही ख्याल है कि कहीं ये छिन न जाए।
कहीं छिन न जाए ये छन
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छिन छिन छिन, छिन न जाए ये छन
डूबा रहता इसी खयाल में ये मन
कहते तो सब इसे बहुत बुरा हैं
मेरी जिंदगी कुछ नहीं बस सुरा है
इस छन मुझे यूं ही पी लेने दे
इस छन को मुझे यूं ही जी लेने दे
जानता हूं एक दिन ये छिन जाएगा
ये छन भी रूठ कर चला जाएगा
तब न कहीं नहीं होगी थोड़ी सुरा
न कहीं होगा कुछ सबसे बुरा
अपने यूं ही हमें तकते रह जाएंगे
हम अपना ही साथ छोड़ चले जाएंगे
बस जब तक ज़िंदगी बहाल है
तभी तक मेरा भी ऐसा हाल है
फिर न तो कहीं ये छन रहेगा
न तड़पता सा कहीं ये मन रहेगा
किसी के पास न कहीं धन रहेगा
और न जी लेने के लिए जन रहेगा
बचाना है छन भर के लिए छन को
छिन जाने के खयाल वाले मन को
और बचा लेनी है थोड़ी सी सुरा
चाहे कोई कितना कहे इसे बुरा
इसके बिना तो जिंदगी अधूरी है
जब तक ये छन है तभी तक ये पूरी है
- संजय सिन्हा
